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भारत की मिट्टियां (Soils of India)
मिट्टी (मृदा) :- पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधे की वृद्धि के लिए प्राकृतिक स्रोत के रूप में पोषक तत्व जल एवं अन्य खनिज लवण प्रदान करती है। पृथ्वी की ऊपरी परत खनिज कानून तथा जीवाश्म का एक मिश्रण है, जो लाखों वर्षों में निर्मित हुई है।
◾भारत एक विशाल देश है जहां विभिन्न प्रकार की मिट्टियां पाई जाती है यहां की मिट्टी के क्षेत्रीय वितरण में असमानता का मुख्य कारण वनस्पति, उच्वाच, तापमान, वर्षा तथा आद्रता जैसे जलवायविक तत्व में भिन्नता का होना है।
◾मिट्टी में पौधे एवं जंतुओं निरंतर सक्रिय रहते हैं जिससे मिट्टी में परिवर्तन होता रहता है इसीलिए मिट्टी को गतिशील कार्बनिक एवं खनिज पदार्थों का प्रकृतिक समुच्चय भी कहते हैं।
भारत की मिट्टी (मृदा) के प्रकार (Types of Soils in India)
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की मिट्टियों को 8 भागों वर्गीकरण किया गया है जो इस प्रकार है :-
- जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
- काली मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)
- लाल मिट्टी (Red Soil)
- लेटराइट मिट्टी (Laterite Soil)
- मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)
- पर्वतीय या वनिय मिट्टी (Mountain or Forest Soil)
- लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soil)
- पीट या जैविक मिट्टी (Peaty and Marshy Soil)
भारत की मिट्टियां एवं विशेषताएं
भारत में निम्नलिखित मुख्यत: 8 मिट्टियों की विस्तार क्षेत्र, उसमें उपस्थित तत्व, उस में उत्पादित प्रमुख फसल एवं उनकी प्रमुख विशेषताएं का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार हैं:-
1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
भारत के क्षेत्रफल के लगभग 40 प्रतिशत भाग पर जलोढ़ मिट्टी का जमाव है। यह नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी है, जो भारत के मैदानी भागों तथा तटीय भागों में पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी में जब बालू के कणों और चीका की मात्रा लगभग बराबर होती है तो उसे दोमट मिट्टी कहते हैं।
धान की खेती के लिए दोमट मिट्टी की उपजाऊ मानी जाती है। दोमट मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस की कमी होती है परंतु पोटाश एवं चूने की बहुलता होती है।
नवीन जलोढ़ मिट्टी को खादर तथा पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बांगर कहा जाता है। यह मिट्टी काफी उपजाऊ होती है। इसमें गेहूं धान, मक्का, तिलहन, दलहन आदि फसलें उगाई जाती है।
भारत की जलोढ़ मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारतीय मिट्टी : जलोढ़ मिट्टी (भारत के लगभग 40% भू-भाग क्षेत्र पर)
- विस्तारित क्षेत्र : सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र का द्वार तथा समुद्र तटीय क्षेत्र
- मुख्य फसलें : धान, गेहूं, गन्ना, आलू, तिलहनी एवं दलहनी फसलें
- पोषक तत्व की प्रचुरता : पोटाश का चूना
- पोषक तत्व का अभाव : नाइट्रोजन फास्फोरस तथा निवासी पदार्थों का भाव
2. काली मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)
भारत में काली मिट्टी मुख्यत: ढक्कन के लावा क्षेत्र में पाई जाती है इसे रेगुर मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी से निर्मित बेसाल्ट चट्टानों से हुआ है। इस मिट्टी को स्वत: जुताई वाली मिट्टी भी कहते हैं क्योंकि इसमें नमी की समाप्ति के बाद दरारे पड़ जाती है।
काली मिट्टी नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है जिस कारण से यह मृदा शुष्क कृषि के अनुकूल होती है। इस मिट्टी का रंग हरा काला होता है क्योंकि इसमें लोहा, चुना, एलमुनियम एवं मैग्नीशियम की बहुलत होती है तथा जैव पदार्थ भी भरपूर होती है। काली मिट्टी कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है इसमें अन्य फसल गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि का भी उत्पादन किया जाता है।
भारत की काली मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारतीय मिट्टी : काली मिट्टी (भारत के लगभग 15% भू-भाग क्षेत्र पर
- विस्तारित क्षेत्र : मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का पठारी क्षेत्र
- मुख्य फसलें : कपास, सोयाबीन, चना ज्वार, गेहूं आदि
- पोषक तत्व की प्रचुरता : पोटाश, चूना मैग्नीशिया व एलुमिनियम
- पोषक तत्व की अभाव : नाइट्रोजन फास्फोरस व जीवाश्म की कमी
3. लाल मिट्टी (Red Soil)
भारत में लाल मिट्टी लाल-पीले रंग की होती है। लोहे के ऑक्साइड के मिले होने के कारण इसका रंग लाल होता है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन फास्फोरस एवं हिम्मत की कमी होती है।
लाल मिट्टी मुख्य रूप से प्रदीपीय भारत (आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) में पाई जाती है। इस मिट्टी में मुख्यता मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा) दलहन, तिलहन एवं तंबाकू की खेती की जाती है।
भारत की लाल मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : लाल मिट्टी (भारत के लगभग 18% भू-भाग क्षेत्र पर)
- विस्तारित क्षेत्र : संपूर्ण तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिण पूर्व महाराष्ट्र, ओडिशा एवं मध्य प्रदेश का दक्षिणी पूर्वी भाग
- मुख्य फसलें : मूंगफली, केला तंबाकू, रागी, ज्वार, तीसी, कपास, गेहूं, मक्का आदि
- पोषक तत्व की प्रचुरता : लोहे की प्रचुरता
- पोषक तत्व की अभाव : नाइट्रोजन, फास्फोरस व जीवाश्म की कमी
4. लेटराइट मिट्टी (Laterite Soil)
भारत में लेटराइट मिट्टी का निर्माण मानसूनी जलवायु की आद्रता एवं शुष्कता के क्रमिक परिवर्तन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न विशिष्ट परिस्थितियों में होता है। इस मिट्टी में लोहा एवं एलमुनियम अधिक होता है किंतु सिलका की कमी होती है। लेटराइट मिट्टी में चुना नाइट्रोजन पोटाश एवं ह्यूमस की कमी होती है। सूख जाने पर यह मिट्टी ईट की तरह कठोर एवं गीली होने पर दही की तरह लिपलिपि हो जाती है।
लेटराइट मिट्टी में चुने की कमी के कारण अम्लीय मृदा है और अम्लीय होने के कारण इसमें चाय की खेती होती है किंतु लोहे की अधिकता के कारण यह अनुर्वर होती जा रही है। यह मिट्टी मुख्य रूप से पूर्वी एवं पश्चिमी घाट पर्वत मलावर तटीय प्रदेश, राजमहल की पहाड़ी क्षेत्र, केरल, कर्नाटक, उड़ीसा, छोटानागपुर एवं मेघालय के पठार में पाई जाती है।
भारत की लैटेराइट मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : लेटराइट मिट्टी (भारत के लगभग 3.7% भू-भाग क्षेत्र पर)
- विस्तारित क्षेत्र : कर्नाटक केरल तमिलनाडु असम महाराष्ट्र उड़ीसा के पर्वतीय क्षेत्र
- मुख्य फसलें : चाय, कॉफी, रबर, सिनकोना काजू आदि
- पोषक तत्व की प्रचुरता : लोहा व एलमुनियम
- पोषक तत्व का अभाव : नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व चूने की कमी
5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)
भारत में अरावली श्रेणी के पश्चिम में जलवायु की शुष्कता एवं भीषण ताप के कारण नंगी चट्टानों विघटित होकर मरुस्थलीय मिट्टी बनाती है। यह मिट्टी बलुई मिट्टी है जिसमें लोहा एवं फास्फोरस की पर्याप्त मात्रा होता है परंतु नाइट्रोजन एवं ही ह्यूमस की कमी होती है।
मरुस्थलीय मिट्टी में सिंचाई के कुशल प्रबंधन के कारण श्रीगंगानगर जिले में चावल एवं गन्ने की कृषि पर रंग की गई है। इस मिट्टी में मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, तिलहन पैदा किए जाते हैं।
भारत की मरुस्थलीय मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : मरुस्थलीय मिट्टी
- विस्तारित क्षेत्र : दक्षिणी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश
- मुख्य फसलें : बाजरा, ज्वार, मोटे अनाज, सरसों, जौं आदि
- पोषक तत्वों की प्रचुरता : लोहा व एलमुनियम
- पोषक तत्व का अभाव : नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, चूना की कमी
6. पर्वतीय मिट्टी (Mountain or Forest Soil)
पर्वतीय मिट्टी पर्वतीय ढालो पर या वन्य क्षेत्रों की घाटियों में पाई जाती है यह अम्लीय मिट्टी है। इस मिट्टी में जीवाश्म की अधिकता होती है परंतु पोटाश फास्फोरस एवं चूने की कमी होती है।
पर्वतीय मिट्टी में बागानी कृषि की जाती है। भारत में चाय, कहवा, मसाले एवं फसलों की कृषि इसी मिट्टी में होती है यह हिमालय के पर्वतीय भागों तमिलनाडु, कर्नाटक, मनीपुर आदि जगहों में पाई जाती है।
भारत की पर्वतीय मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : पर्वतीय मिट्टी
- विस्तारित क्षेत्र : कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश के पर्वतीय भाग
- मुख्य फसलें : सेब, नाशपाती एवं आलू
- पोषक तत्व की प्रचुरता : जीवाश्म की अधिकता
- पोषक तत्व की अभाव : पोटाश, फास्फोरस एवं चूने की कमी
7. लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soil)
लवणीय मिट्टी को रेह, उसर व कलर के नाम से जाना जाता है। इसका विकास शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में हुआ है जहां जल निकास की समुचित व्यवस्था का अभाव है। इसमें सोडियम कैल्शियम एवं मैग्नीशियम के वन पाए जाते हैं परंतु नाइट्रोजन एवं चूने की कमी होती है।
लवणीय मिट्टी का विस्तार दक्षिणी पंजाब दक्षिणी हरियाणा पश्चिमी राजस्थान के अवतार सुंदरबन क्षेत्र में हुआ है। तटीय क्षेत्र में इस मृदा में नारियल के पेड़ बहुत मिलते हैं।
भारत की लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : लवणीय मिट्टी
- विस्तारित क्षेत्र : लक्ष्मी गुजरात पूर्वी तट के डेल्टा क्षेत्र व सुंदर वन क्षेत्र
- मुख्य फसलें : बरसीम, धान, गन्ना, गेहूं, आंवला, फालसा तथा जामुन
- पोषक तत्व की प्रचुरता : सोडियम, पोटैशियम व मैग्निशियम
- पोषक तत्व की अभाव : नाइट्रोजन एवं चूना
8. पीट या जैविक मिट्टी (Peaty and Marshy Soil)
पीट मिट्टी में कार्बनिक एवं जैविक पदार्थों की अधिकता होती है यह मिट्टी काली भारी एवं काफी अम्लीय होती है यह मिट्टी मुख्यत: भारी वर्षा और ऊंची आद्रता वाले क्षेत्र में पाई जाती है।
पीट मिट्टी मुख्यता केरल के एलैपी जिला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा, सुंदरबन डेल्टा एवं अन्य निचले डेल्टा क्षेत्रों में पाई जाती है। केरल में इस प्रकार की मिट्टी में नमक के अंश पाए जाते हैं जिससे यहां 'कारी' कहा जाता है।
भारत की पीट या जैविक मिट्टी एवं उसकी विशेषताएं
- भारत की मिट्टी : पीट या जैविक मिट्टी
- विस्तारित क्षेत्र : केरल के अलप्पुझा जिला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा एवं सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र
- प्रमुख फसलें : --
- पोषक तत्व की प्रचुरता : कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक।
- पोषक तत्व की अभाव : पोटाश एवं फॉस्फेट की कमी
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